हमारी नन्ही परी

हमारी नन्ही परी
पंखुरी
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Friday, October 7, 2011

रानी बिटिया ......गुड गर्ल !!!

पंखुरी बेटी जब एक साल की भी नहीं हुईं थीं तभी से उन्हें हर काम अपने आप करना होता था फिर अब तो वो बड़ी हो रही हैं.अब तो उनकी समझदारी और स्वावलंबन और भी ज्यादा हो गया है.


पता है...अब तो बेटी अपनी दवाइयां भी खुद ही पीने लगी हैं वो भी बिना रोये-धोये ..... आप खुद ही देख लीजिये न.....




ये बेटी की दवाई है येल्लो.......और पिंक वाली.....
ये उठाया ......
....और ये मुंह में गयीईईईईई..... 
ऊँहू......तीत्ताआआआआ (मतलब इसका टेस्ट अच्छा नहीं है)
अब इस ब्लैक वाली की बारी.........
बेटी को इसका टेस्ट पसंद है.....पापा ने बोला कि ये आयरन है...
वाओ.... मीथा-मीथा  आयरन...
रानी बिटिया ......गुड गर्ल !!!

Friday, June 24, 2011

पंखुरी की बातें (3)

पंखुरी बेटी बीस जून को पूरे ढाई साल की हो गयीं और पता है उसी दिन बेटी ने अपना पहला पूरा सेंटेंस (वाक्य) बोला- चाचू , तीबी नाई आ लई ऐ . (चाचू ,टीवी नहीं आ रही  है.)
है न मज़ेदार बात. अब पंखुरी की बातें और भी स्पष्ट हो रही हैं.वो नयी बातें कहना और समझाना भी सीख रही हैं.अब घर से जब कोई बाहर जाता है तो बेटी कहती है - टाटा, बाय-बाय, सी यू और फिर कहती हैं - जल्दी आना ... पहले कहती थीं आयेंगे लेकिन अब सीख लिया है कहना - जल्दी आना...

पापा जब बाथरूम में होते हैं तो पंखुरी बाहर खड़े हो कर आवाज़ देती रहती 
हैं . पहले ऐसा करते हुए कहती थीं - पापा कोल्लो...बाबू कल्ली.... (पापा खोलिए, पंखुरी खड़ी है...) लेकिन अब बात और स्पष्ट हो गयी है और बेटी कहती हैं - पापा खोलो, पंकुई खल्ली ऐ


 
पंखुरी ने आज ही एक और नया वाक्य कहना सीखा - सारे बिस्तर-तकिये-गद्दे पर उछल-उछल कर कूदना और ज़ोर-ज़ोर से कहना - मज्जा आ लहा ऐ .(मज़ा आ रहा है.) 
और हाँ ...पंखुरी बेटी आजकल घर भर की नयी अलार्म-घड़ी बन गयी हैं. इसके लिए बेटी ने पहले अर्ली टू बेड एंड अर्ली टू राइज़ के फंडे पर अमल किया मतलब रात नौ बजे तक सो जाना और सुबह पांच बजे जाग जाना ...अब जब बेटी सुबह उठती हैं तो बाबा के सिवा घर के सभी लोग सो रहे होते हैं. ऐसे में बेटी सबसे पहले बुआ के पास आती हैं और कहती हैं - बुआ उत्तोSSSS ,पंकुई जग .... (बुआ उठो, पंखुरी जग गयी है) फिर चाचू  और पापा  को जगाया जाता है, वो भी इतने  प्यार से ,कि उठने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचाता...

पंखुरी , तनु दीदी के साथ...
 एक और बहुत मज़ेदार खबर.....बुआ के बेड पर सुबह-सुबह धूप आ जाती है. खिड़की के ठीक सामने सूरज उदित होता है. जब पंखुरी बेटी बुआ के साथ सोती हैं तो इस धूप से बहुत परेशान होती हैं. फिर बुआ ने बेटी को बताया कि जैसे चंदा मामा रात में आते हैं वैसे ही सुबह सूरज चाचू आते हैं और वही अपने साथ धूप लाते हैं... बस फिर क्या था ... can you believe ? पंखुरी बेटी ने अपने आप से एक नयी कविता बना डाली - 

छूलज चाचू आयेंगे ... 
दुप्प (धूप) लायेंगे ... 
मिथाई लायेंगे ... 
कोन्ना (खिलौना) लायेंगे...!

और अब सुबह-सुबह पंखुरी धूप देख कर ये कविता गाती रहती हैं.

Tuesday, May 3, 2011

समझदार हो रही है बिटिया...

इस बार बेटी के बहाने कुछ हमारे मन की बातें....

इस ब्लॉग का असली रंग है  हमारी पंखुरी बेटी की मासूम बातें , भोली शरारतें , नटखट अदाएं और उनकी तोतली भाषा में की गयीं वो सारी प्यारी बातें जो वो हमसे करती हैं . इस ब्लॉग का उद्देश्य है इन सारी अनमोल अनुभूतियों को उकेर देना... 
लेकिन ईमानदारी से कहूं ऐसा शब्दशः हो नहीं पाता. विशेषकर ज्यों-ज्यों पंखुरी बड़ी हो रहीं हैं उनके रंग समेटने के लिए मानों हमारी लेखनी की  सामर्थ्य छोटी होती जा रही है. जब तक उनके साथ रहो...हर पल में इतना कुछ होता है कि समझना मुश्किल है कि क्या लिखें ,क्या छोड़ दें . 



बेटी के बड़े और समझदार होने की प्रक्रिया में कितने ही खूबसूरत पल आते हैं जो जाने कितना कुछ सिखा भी जाते हैं . कभी-कभी पंखुरी के समझदार होने की ये प्रक्रिया मन में टीस भी पैदा करती है.अब हम उसको सिखा रहे हैं - अग्गा नहीं दाल...मम्म नहीं पानी ...ओई नहीं चिड़िया...नूनू नहीं मोज़े...एम्मी नहीं आइसक्रीम...निन्ना नहीं मंदिर...(ये सब शब्द भी बेटी का ही अविष्कार हैं)
 अगले साल से स्कूल जाने की तैयारी का पहला चरण है ये...और कमाल पंखुरी बेटी की ग्राह्य क्षमता का......... कि एक बार बताई बात उन्हें तुरंत याद हो जाती है. 


...लेकिन उनके सब सही-सही सिखाते जाने की प्रक्रिया कहीं चुभती सी है. महसूस होता है कि धीरे-धीरे बेटी सब कुछ शुद्ध बोलना सीख लेगी.सब समझने लगेगी.अच्छे-बुरे ,सही-गलत ,नहीं-हाँ के बीच के भेद को जान लेगी.  मासूमियत , भोलापन और नटखट शरारतें धीरे-धीरे  समझदारी, दुनियादारी,  परफेक्शन और परिपक्वता में तब्दील हो जाएँगी ...(जैसा हम चाहते  भी हैं) और फिर ये मासूम बचपन एक अनमोल धरोहर सा बस हमारी स्मृतियों में संचित हो जायेगा.
सबके बड़े होने की प्रक्रिया तो यही होती है. हमारी भी यही रही होगी ...ये सोच कर मन इस अजब एहसास की टीस से छुटकारा पाने की कोशिश करता है.
सच इंसान को बड़ा और समझदार होने की कीमत कितनी अमूल्य  चीज़ देकर चुकानी पड़ती है...पंखुरी  से ही अनजाने में ये बात भी जानी-सीखी है हमने. 



हाँ सचमुच बहुत तकलीफदेह एहसास है बचपन का खो जाना...और बहुत मुश्किल है - बड़े होते जाने और दुनियादार बनते जाने की सख्त प्रक्रिया के बीच अपने बचपन और मन के किसी कोने में दुबके भोलेपन-मासूमियत को बचाए रखना ...
जाने कैसे...लेकिन हम तो कर पाए हैं ऐसा ...
जो कुछ छूटने लगा था वो पंखुरी से मिल कर फिर वापस आ गया है...


ऐसे में जब समय को रोक पाना न तो संभव है... न ही उचित...
ईश्वर से पंखुरी बेटी के लिए, उसकी बुआ यानी मेरी  यही प्रार्थना है कि...
चाहे वक्त कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाए ...समझदारी कितनी भी धारदार क्यों न हो जाए ....
हमारी पंखुरी बेटी की मासूमियत, 
दिलकश मुस्कान,
 निश्छल झरने सी खिलखिलाहट ,
 संवेदनशीलता,
 कोमलता 
और सबको अपने स्नेहमय पाश में बाँध लेने की जादुई सामर्थ्य हमेशा-हमेशा ऐसी ही बनी रहे.
उसकी अच्छाई-सच्चाई और निश्छलता को किसी की नज़र न लगे.

आमीन...
   

Saturday, January 22, 2011

पंखुरी सीख रही है :) - (एक)

जी हाँ, पंखुरी सीख रही है रोज़, लगातार ... और सीख रहे हैं हम भी...,अरे भई.... उनकी बात समझने के लिये हमें भी तो सीखना पढता है न.......! अब बिटिया सुबह सबके जाने के बाद बताती हैं "बुआ औपिचऽऽ" , "तातू औपिचऽऽ", "बाबा औपिचऽऽ" मतलब सब office गये.
शाम को सबके लौटने पर, पहले अंदर से या खिडकी पर आ कर पूछती हैं     " तोन एऽऽऽ" और फिर खुश होकर बताती हैं " पापा आग्गीऽऽऽ" , "तातू आग्गीऽऽऽ" , "बाबा आग्गीऽऽऽ".
बिटिया के घर के सामने एक छोटी सी दुकान है मगर उनकी सारी खरीददारी वहीं से होती है. दुकान पर एक लडका बैठता है जिसका नाम अभय है... तो बेटी सुबह और शाम पहले अपनी फ़रमाइश पेश करती हैं      " अब्बे तौपीऽऽऽ" फिर पापा, चाचू,बाबा, बुआ जो भी हो, उसके साथ वहाँ जाती हैं और अभय की दुकान से टाफ़ी खरीदती हैं .उन्हें सिर्फ़ जेम्स पसंद है ये बात अभय को पता है फिर भी अगर दूसरी टाफ़ी दी जाए तो पंखुरी साफ़ कहती हैं "नईंऽऽ". हैं न बढिया बात...
इस बार की पोस्ट में बेटी की अलग-अलग मूड की फ़ोटोज़... जिनमें उनके लगातार सीखने की कहानी भी छुपी है, आप भी देखिये-----
अपने पाँव पर खडा होने की कोशिश...
चाभी खाई नहीं जाती बच्चे...
बीस दिसम्बर २००९... बेटी का फ़र्स्ट बड्डे...
हमारी गोलगप्पी ऽऽऽऽऽ
पंखुरी - द म्यूज़िशियन...
ऊफ़ऽऽऽऽऽ गर्मी
बनारसी गमछा...
जब पहले-पहले खाना खुद खाना सीखा...
पहले-पहले पानी पीना....
गाडी स्टार्ट....
ये हेल्मेट है भाई....
छुप-छुप खडे हो , ज़रूर कोई बात है...है न ऽऽऽऽ
आइसअक्रीम पार्लर में आ कर तो बडा कन्फ़्यूज़न है....
कि कौन सा फ़्लेवर खाया जाए...
ये फ़ोटो बेटी के फ़र्स्ट बड्डे की सुबह की, जब सबने बिटिया को पहला जन्मदिन विश किया..., बेटी की स्माइल तो देखिये....!